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सर्वसुख प्रदायिनी कुरुकुल्ला साधना

तद्यंत्रम हेमरुप्ये वा भूजेम वालिख्य धारणात । 

समस्तरोग दुखर्तिर्हितो वर्धते सुखी ॥ 

 

अर्थात -

इस यन्त्र को सोना, चांदी या भोजपत्र पर अंकित करके धारण करने से समस्त रोग तथा दुःख क्लेश से रहित होकर साधक सुखी होता हैं ।

— तंत्रराजतन्त्रम, द्वाविंशः पटल, श्लोक ६१

 

उक्त श्लोक कुरूकुल्ला यन्त्र के लिए कहा गया हैं जो कि २५ विध्या अक्षरों से सुसज्जित हैं । अति शक्तिशाली एवं सुख – समृद्धि देने वाला यह यन्त्र माँ गौरी का सद्रश रूप माना जाता हैं  । इस यन्त्र के विभिन्न प्रयोग हैं जिनका वर्णन मैं निचे एक के बाद एक कर रहा हूँ ।

साधक बंधुओं से निवेदन हैं कि अपनी आवश्यकता अनुसार इस यन्त्र का प्रयोग करें ।

 

वशीकरण हेतु प्रयोग -

विधि – यन्त्र को एक सफ़ेद रंग के रेशमी वस्त्र पर बना कर ( बनाने के लिए लाल रंग के कुमकुम की स्याही का प्रयोग करें एवं जन्हा तक हो सके यन्त्र निर्माण कार्य शुक्ल पक्ष की अष्टमी अथवा नवमी को प्रातः ६ से ८ बजे के मध्य ही करें ) विधि विधान से इसकी पूजा करें ।

तत्पश्चात साध्य व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए निम्न मंत्र के १००८ ( एक हजार आठ ) जप करें । यह प्रक्रिया प्रतिदिन प्रातः काल ६ से १० के बीच एक माह तक करें । प्रक्रिया समाप्त होने पर यन्त्र एवं जप में उपयोग की गयी माला ( इस प्रक्रिया में रुद्राक्ष की माला का प्रयोग किया जाएगा ) को बहते हुए जल में प्रावाहित कर देवें । शीघ्र ही मन वांछित फल की प्राप्ति होगी ।

मंत्र -

कुरुकुल्लायः ॐ कुरुकुल्ले ह्रीं मम सर्वजनं वशमानय ह्रीं स्वाहा । 

 

पुत्र प्राप्ति हेतु प्रयोग -

विधि – एक १२” X १२” की काष्ठ ( लकड़ी ) अथवा मिट्टी  की चौकी पर गेरू तथा चन्दन से प्रस्तुत यन्त्र का निर्माण किया जाए । यन्त्र निर्माण के समय साधक के द्वारा लगातार ” ऐं ” बीज का उच्चारण किया जाना चाहिए हैं । यन्त्र निर्माण शुक्ल पक्ष की प्रथमा को दोपहर १२ से ४ के बीच किया जाना चाहिए हैं ।

इस यन्त्र की पूर्ण विधान से ३ माह तक पूजा करने के उपरांत इसको बहते जल में प्रवाहित कर दिया जाना चाहिए हैं । साधक की मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण होगी ।

 

शारीरिक दुखों से मुक्ति हेतु - 

विधि –   जैसा कि प्रथम श्लोक में वर्णित हैं यदि इएस यन्त्र को सोने, चांदी अथवा भोजपत्र पर बना कर अपनी दाहिनी भुजा में धारण किया जाए तो शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती हैं । इस यन्त्र का निर्माण शुक्ल पक्ष की अष्टमी को संध्याकाल में किया जाना चाहिए हैं ।

 

यन्त्र -

 

Kurkulla Yantra for Vashikaran

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